Pathjad mein bhi phul khil jata hai,
Kuch lasho ko kafan bhi nasib nahi hota,
Kuch pe TAJ MAHAL ban jata hai.
Dilka Paigam de to kabul kijiye,
HAr sawal ka jawab jaruri nahi,
Magar hum apko kyo karte hai yaad uska jawab to dijiye.
बे-करार आंखों को..
बद-नसीब कदमों को..
जिस तरफ़ भी ले जायें..
रास्तों की मर्ज़ी है..बे-निशां जज़ीरों पर..
बद-गुमा शहरों में..
बे-ज़ुबां मुसाफ़िर को..
जिस तरफ़ भी भटकायें..
रस्तों की मर्ज़ी है..रोक लें या बढने दें..
थाम लें या गिरने दें..
वस्ल की लकीरों को..
तोड दें या मिलने दें..
रास्तों की मर्ज़ी है..
अजनबी कोई लाकर..
हमसफ़र बना डालें..
साथ चलने वालों की..
राह जुदा बना डालें..
या मुसाफ़तें सारी..
खाक मे मिला डालें..
रास्तों की मर्ज़ी है..
thi talash khuda ki, bande ko khuda banaa liya.
agar chala na buss toh ishq ko sar per chada liya
phir kisi begane ko dil ka devta bana liya
uski yaad mein apna har ek katra baha diya
phir bhi na janey kyu unko yaad karke ye dil aaj phir muskura diya
ye dil phir muskura diya……………….
Iss kadar Chot Khaye Hue Hain,
Mout Ne Humko Mara Hai Or Hum
ZINDAGI Ke Sataye Hue Hain!!
apne ishq ki shamma har dil mein jaga denge
mano ya mano tum ye tumhari marzi
per hume tumhe hamari yaad mein ,
SHAYARI karna toh seekha denge
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
कभी कभी बहूत सुकून देति है
हर’पल चुभ’ने वाली तन्हाई भी
जाने कैसा मौसम आ गया है की
गुम हो गयी है कहीं आप’की पर’छाई भी
किसी के प्यार में इत’नी सच्चाई हो कि
कम लग’ने लगे सागर कि गह’राई भी
दिल अगर साफ़ हो उस’का तो
आंसुओं में नज़र आये सफ़ाई भी
पार रह’कर अगर भर दे दामन खुशियों से
तो यादों की सौगात लाये उस’की जुदाई भी
दिल को छु ले अगर बातें उस’की
तो मासूम हो उस’की रुस’वाई भी
किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जायें
मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के
न जाने ये किस मोड़ पर डूब जायें
कुछ फ़ासले बनाये रखना
अपनी अंतरंगता छिपाये रखना
न कहना किसी से दास्तान-ए-मोहब्बत
हकीकत ये सबसे छुपाये रखना
न जाने कब किसकी नज़र लग जाये
नज़रों से खुद को बचाये रखना
मिले हैं तो बिछ्ड़ेंगे ज़रूर लेकिन
हो सके तो यादों को सजाये रखना
हर बार कोई ज़ख़्म नया क्यों नहीं देते?
चुपके से मुझे आके सदा क्यों नहीं देते।
है जान से प्यारा मुझे ये दर्द-ए-मोहब्बत
कब मैंने कहा तुमसे दवा क्यों नहीं देते।
गर अपना समझते हो तो फिर दिल में जगह दो
हूँ ग़ैर तो महफ़िल से उठा क्यों नहीं देते।
जब कोई ख्याल दिल से टकराता है ॥
दिल ना चाह कर भी, खामोश रह जाता है ॥
कोई सब कुछ कहकर, प्यार जताता है॥
कोई कुछ ना कहकर भी, सब बोल जाता है ॥
ऐसे डर कर ना गुमसुम रहा कीजिये
रात भर साथ अपना निभा लीजिये
है कयामत के दीदार की आरज़ू
फिर से चेहरे से घूँघट हटा लीजिये
मुझको कुछ भी मय्यसर हुआ ना सही
आखिरी जम हँसकर पिला दीजिये
हम तलबगार होंगे तेरे उम्र भर
बस हकीकत तो अपनी बयां कीजिये…
होता कैसे उन्हें गम हमारी रुसवाई का….
जब फर्क पड़ा ही नहीं हमारी जुदाई का…..
खामोशी से सहा हमने जब सारे गम….
तो इल्जाम लगा दिया बेवफाई का…….
एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं
दुनियावाले, दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं
अपनों की ही बाँहो में मरते हुए देखा है
टूटते, बिखरते, सिसकते, कसकते
रिश्तों का इतिहास,
दिल पे लिखा है बेहिसाब!
प्यार की आँच में पक कर पक्के होते जो,
वे कब कौन सी आग में झुलसते चले जाते हैं,
झुलसते चले जाते हैं और राख हो जाते हैं!
क्या वे नियति से नियत घड़ियाँ लिखा कर लाते हैं?
कौन सी कमी कहाँ रह जाती है
कि वे अस्तित्वहीन हो जाते हैं,
या एक अरसे की पूर्ण जिन्दगी जी कर,
वे अपने अन्तिम मुकाम पर पहुँच जाते हैं!
मैंने देखे हैं कुछ रिश्ते धन-दौलत पे टिके होते हैं,
कुछ चालबाजों से लुटे होते हैं-गहरा धोखा खाए होते हैं
कुछ आँसुओं से खारे और नम हुए होते हैं,
कुछ रिश्ते अभावों में पले होते हैं-
पर भावों से भरे होते है! बड़े ही खरे होते हैं !
कुछ रिश्ते, रिश्तों की कब्र पर बने होते हैं,
जो कभी पनपते नहीं, बहुत समय तक जीते नहीं
दुर्भाग्य और दुखों के तूफान से बचते नहीं!
स्वार्थ पर बनें रिश्ते बुलबुले की तरह उठते हैं
कुछ देर बने रहते हैं और गायब हो जाते हैं;
कुछ रिश्ते दूरियों में ओझल हो जाते हैं,
जाने वाले के साथ दूर चले जाते हैं !
कुछ नजदीकियों की भेंट चढ़ जाते हैं,
कुछ शक से सुन्न हो जाते हैं !
कुछ अतिविश्वास की बलि चढ़ जाते हैं!
फिर भी रिश्ते बनते हैं, बिगड़ते हैं,
जीते हैं, मरते हैं, लड़खड़ाते हैं, लंगड़ाते हैं
तेरे मेरे उसके द्वारा घसीटे जाते हैं,
कभी रस्मों की बैसाखी पे चलाए जाते हैं!

